नींद को पुकार

झांको! आँखों में उसे जीतने की बहार है।

पैरों में शांत घुंगरुओं की झंकार है।

हांथों के इशारे मानो उसकी पुकार है।

फिर भी देखो वो मुझसे कितनी बाहर है।

शैय्या पर शव मानो धरती का भार है।

आवरण शान्ति मिलन हुआ हजार है।

अब क्यों तू बाहर है?

क्योंकि मन आपे से बाहर है।।

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