उसकी खोज

कहाँ गई वो - 
ढलते सूरज की बेला में
दो युगलों की क्रीडा में
मन ऐसा जमा
मुझे आभास हुआ
कहाँ गई वो
कमलनयन से रूपांतरित चेहरे वाली
वो सुंदरी
जो अब मेरी कल्पना है
या कल्पना में रह गई है
कहाँ गई वो
जब भी विचारु
कहीं तो खो जाऊ
उसे निहारु
कल्पना है
विचारु कहाँ गई वो
सब से पूछु
फिर खुद से
मुझे मिल जाती है
फिर से उसे निहारु
मात्र उसी को विचारु
कहाँ गई वो
इस जग में कहीं
या मेरी कल्पना में
कहीं तो हो
फिर से पूंछू कहाँ गई वो
इतने वर्ष गुजरे
दिन गए रातें गुजर गई
लेकिन यहाँ से वो न गुजरी
कहीं भूल न जाऊ
उससे दूर न जाऊ
यही डर है
कल्पना है सच नहीं है
यही दुख है
उसको भूलने का कष्ट सहना नहीं है
इसलिए उसको याद करता हूँ
कहीं तो होगी ही 
ये कष्ट होने नहीं देता
लेकिन कहाँ है वो
ये विचार मैं
मन ही मन रोता। 


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