पछतावा
"शीतल हवा है इक दवा
और देह हेतु हमनवा।"
सुन बात यह
घर से बाहर आता हूँ
और पाता हूँ
कुदरत का वरदान
ठंडी, मंद हवा
और घिरे सिर पर घने मेघा
अंदेशा है बरसात का
बिना किसी के साथ का
और हो गया गुम याद में
भूत की फरियाद में।
तभी एक आवाज आई
बिजली ने तबाही मचाई
उठाया सिर
देखा उस ओर
बारम्बार बिजली कड़काई
और
तभी
एक छाया दी दिखाई
होगा कोई
मेरी तरह
विचार
पुनः यादों में गुम।
एक बार फिर
बिजली कड़काई
इस बार कुछ तेज,
उठा सिर
देखा फिर से
दी दिखाई
वही परछाई
इस बार
और स्पष्ट
और पास
धड़कने दिल की
इतनी तेज
दे सुनाई आपको भी
और शायद उस परछाई को भी
इसलिए कितनी पास आ गई
डर मन में है
और हिम्मत शरीर में
इसलिए हिल न पाया
या उसकी करतूत?
कुछ भी हो!
लेकिन
वो पास आ रही है
हवाएं तेज और बिजली भरी मेज
तभी
एक बिजली कड़की
जो दिखा
हिम्मत पूछ उठा भाग खड़ी
लेकिन
मैं नहीं!
दिखा उसका चेहरा
वही कपड़े, वही कंगन
जो
मरण में साथ थे
वो
चलती, हवा में
करीब आ रही थी
और यादें मेरी
मेरा दिमाग़ खा रही थीं।
आ गई वो
ठीक मेरे सामने
हम दोनों
फिर एक बार
आमने-सामने
पता था
इम्तिहान के सवाल
जिनके थे जवाब मेरे पास
लेकिन
सवाल न हुआ
जो हुआ
मन में बबाल हुआ
कहा उसने
"लेने तुम्हें साथ मेरे
वादा पूरा करने फेरे
साथ चलो
और पूर्ण वादा करो
हूँ मानती तुम्हारी वस्था
न निभा पाए साथ
अब चलो
फिर न कोई फरियाद"
प्रश्न! अब मत उगो
रुको! पूछता हूँ तुम सबको!
उससे पहले -
"पुष्पलता कहाँ गई थी तुम
अधूरा कर इस तरु से वर को
और आते ही
इतनी बातें।
अरे! हाय मेरी बुद्धि!
आओ, बैठो यहाँ
और
लो आनंद इस शीतल मंद हवा का
जो सुगंधित भी हो गयी
आने से तुम्हारे!
देखो वो बादल
जिसने
बारिश मंद शुरू कर दी
कोमल बूंदे
दोनों के तन को छूती
देखो वो उड़ता फूल
आया गोद में
ममता पाने
बिल्कुल अपने बालक.......
देखो वो बिजली
मधुर ध्वनि कर रही है
बिल्कुल तुम्हारी तरह..."
"और वो छाता
खड़ा अडिग है
करता सुरक्षा
बिल्कुल तुम्हारी तरह"
रोक बीच में कहा
लेकिन
ज्ञात नहीं
क्यों क्रोध न आया
बल्कि और प्रेम छाया
"तरुवर मेरे
है न ज्ञात तुम्हें
बिन तेरे, ये पुष्पलता विचार जीवन का कर नहीं सकती
इसलिए साथ चलो
और पूर्णता करो।"
"बातें फिर से चालू कर दी
ज्ञात है न!
संयम न मुझमें
जिससे क्रोध जगाई और प्रेम दुहाई
इसलिए बात बस मेरी सुनो!
करनी है जो बहोत,
तुम्हें याद है न! वो शाम
बिल्कुल आज की तरह
थे अजनबी
बैठ दूर
करते कोशिश
आने की पास
और जब आए
तब
ये तरुवर पुष्पलता से महकने लगा
और याद है वो सुबह!
जल अर्पण तुमने मुझे किया
और बांहों में मैंने थाम लिया
तभी
मुन्ना आया और..........
और याद है
जब मैं रूठा था
तब खाने में एक संदेशा
एक और व्यक्ति के आने का
और याद है
मैंने क्या किया
मारी छुट्टी और पूरे दिन तुम्हें तंकता गया
पुष्पलता!
तुम मेरी पूर्णता हो
तुम क्यों चली गयी?
अपने तरुवर को अकेला छोड़
अब तो न जाओगी!
वादा करो
पुष्पलता!
वादा करो।"
और आंखों से आसूं।
"ये असम्भव है
है कुदरत का दस्तूर
वादा करना असम्भव है।"
"क्यों असम्भव है?
नियम बनाया किसने?
कौन है ये कुदरत?
बहाना मत बनाओ!
आओ! अब मेरे साथ आओ!
अगर मानती हो तरुवर अपना मुझको
सृष्टता तुम्हारा अर जीवन का मुझको
आओ अब मेरे साथ आओ!
सौगंध प्रेम की देता तुमको
इस वादे से मत मुड़को
आओ अब मेरे साथ आओ!
हे पुष्पलता!
पुनः अपने तरुवर में समा जाओ।"
"तरुवर मेरे
समझो बात
थी मैं इस कुदरत से और तुम हो अभी
है अवस्था मेरी वो नियति मेरी,
इसलिए आई हूँ
साथ तुम्हें लेने
क्योंकि
नहीं मैं कुदरत से बड़ी
और न तुम
इसलिए लौटा लो सौगंध
और करो हस्तबंध।"
"बातें वही
क्यों दोहराती हो
समझ चुका एक बार
फिर क्यों लाती हो
ज्ञात तुम्हें गुस्सा मेरा
प्रेम फीका पड़ता तेरा
घटना घटती वही पुरानी
क्या नहीं चाहती बनना मेरी रानी।
हो गई थी गलती
अब पछताता हूँ
क्रोधवश मैं तुम पर हाथ उठाता हूँ
और तुम चली गयी
वापस आई हो
जाने की बात मत करना
वरना वही घटना दोहराई जाएगी
लेकिन
इस बार
होगा मेरा मरना
रुको!
जीकर के भी होगा मरना
पुष्पलता मेरी!
क्यों नहीं रोका
बीच में क्यों नहीं टोका
जानते है सब
अबला का स्वभाव
कमजोर, लाचार
लेकिन
तुम उसे अज्ञान कहती
रोकती मुझे
मेरे हाथ क्यों सहती
मुनियों की बात है
क्रोध विवेक का नहीं साथ है
तुम तो करा देती
हाथ रोकती सिर सहला देती
शक्ति थी
फिर क्यों नहीं?
लता जल रही थी
पुष्प सड़ रहे थे
गिर रही थी उनकी लाल पत्ती
और ये तरुवर
अपनी जड़ जला रहा था
अग्नि में खुद के साथ तुम्हें भी खा रहा था
और जब लता जल गयी
बुझ गयी आग
माँगा पानी
लेकिन
सब बेकार
सब ख़त्म
तुम भी
तुम्हारा साथ भी
अब लौटी हो
जाने की बात मत करना
और
अगर
ठुकराओगी
तो
ये बदन
सूखा पाओगी
क्या देख सकती हो?
अपने तरुवर का ये हाल
अगर हाँ तो चली जाओ
लेकिन
अकेले
अगर नहीं तो रह जाओ
और
इस तरुवर को प्रेम पाश में बांध लो
दो ही मार्ग है
आखिर
अस्तित्व तुम्हारा बिन मेरे है कहाँ?"
"ये नियम कोई खेल नहीं
हो सकता कोई फेर नहीं
इसलिए
तुम्हें समझाती हूँ
और
अपने साथ बुलाती हूँ
वह आग बुझाना मैं भी चाहती हूँ
अगर
तुम साथ दो।
मिलन हमारा फिर से हो जाएगा
एक नया पेड़, उस पर लता और पुष्प
फिर से
बोआ जाएगा
बस
बात मेरी मानो
सब ठीक हो जाएगा
पहले जैसा।
मैं तुम्हारी विश्वासु हूँ
हूँ दर्दनाशी,
हूँ मैं तुम्हारी हसीं
जो कभी न जाएगी
हूँ तुम्हारी मैं शोभा
जो न कभी मुरझायेगी।
बस
साथ हो लो मेरे
मैं सब ठीक कर दूंगी
और
फिर
कभी न विदा तुमसे लूंगी
इसलिए कहती चलो साथ
मैं असमर्थ
इसलिए कहती ये बात।"
"उत्तर चाहिए तुम्हें
बात मेरी मानोगी नहीं
जिद करो
ऐसी करो
घाटा न हो
बीच में दरार न हो,
ज्ञात है न दुनिया का दस्तूर
दस्तूर या उसकी भूल?
कुछ भी हो
लेकिन
आदमी अपनी अबला का अधिकारी
वही करे उसकी रखवाली
उसका पोषण
और
सब दुनियादारी।
है यह समाज की गलती
रेखा की जिम्मेदारी
करो तुम ये
और
खाते में तुम्हारे ये
करो भूल
और होगी थू थू भारी,
और
तुम कहती
सब ठीक करोगी
मैं नहीं समर्थ जो तुम करोगी?
क्यों करोगी?
बात मान सकती हो मेरी!
तब क्यों करोगी?
है यह जिम्मेदारी मेरी
खुश रखना और रहने की
उसे तुम क्यों निभाओ
जब मैं समर्थ!
बड़ी मुझसे समझती हो!
या बड़ी बन गयी हो!
तुम अबला हो
आदमी नहीं
और
तुम्हारी कुदरत के नियम की तरह
नियम समाज के कोई खेल नहीं
है समाज पुरुषप्रधान
लेकिन
गलती पुरुष की ही
क्या चाहती हो?
तेरा ये तरुवर
नाक कटा दे
अपना भार तुम पर छोड़।
और
छोड़ो समाज की बात
वो बीस साल
और
मेरा वादा
भूल गयी?
जिनमें
भार तुम्हारा मैंने लिया
और
तुम्हें अपने भार से आजाद किया
जिससे
मुस्कुराहट देखूँ
बाट से क्षोभित मुख पर
आने से मेरे
खिलतीं मुस्कान देखूँ
गरम भोजन की उठती खुशबू में
मैं तेरा प्यार देखूँ
बातें प्यार भरी से
नीची आंखे
और
खिलता चेहरे पर ग़ुलाल देखूँ
बन तेरे पैरो का गुलाम
हर समय
तुझ पर हजारों सौगात फैकूँ
और
तुम चाहती हो
आश्रित मैं हो जाऊं।
लेकिन
फिर वो प्रेम न पा पाओगी
देह यह तुम्हारे पास
प्रेमात्मा मर जाएगी
क्योंकि
ये समाज मुझे मार देगा
अपनी बातों से मेरी इज्जत
भूमि में गाड़ देगा
इतनी गहरी फिर निकल न पायेगी
इसलिए उत्तर 'नहीं' है!
सफर तुम्हारा सुखमय
और
जीवन मेरा दुखमय
मैं जी लूंगा
लेकिन
तुम्हारे साथ न चालूँगा,
रह जाने दो प्रेम अधूरा
मैं अधूरा तुम अधूरी
और
यह कहानी भी
पर
मैं न चल पाऊँगा
रह लूंगा बिन तेरे
याद के करता रहूँगा सदा फेरे
जब तुम याद आओगी।
जाओ
पुष्पलता मेरी!
सफर सुहाना हो,
और
विनती मेरी
कभी याद कर लेना
कोई फरियाद हो
फरियाद कर लेना
मिलना हो
आ जाना
यहीं मिलूंगा
सफर अकेला सुहाना हो।"
"उम्मीद तुमसे ये न थी
होता कोई
कहता ये
तो समझ जाती कारण
लेकिन
तुम!
तुम ऐसे कैसे हो गए?
प्रेम में इज्जत बो गए?
अलावा पुष्पों के
प्रेम बाग में
कोई अन्य उगा
तो विशुद्धता मिट गयी,
और
इज्जत और प्रेम
दोनों
विरुद्ध राही
कैसे साथ हो?
इसलिए
इज्जत छोड़ो
प्रेम से सोचो
क्योंकि
इज्जत में पूरे तुम
प्रेम में अधूरे तुम
और
इज्जत के ऊपर
प्रेम ठुकराते हो
क्या नहीं पूर्णता चाहते हो?
और
छोड़ो
इज्जत की बात
जानते हो तुम
दो प्रेमियों की समानता?
समान जिम्मेदारी!
समान हिस्सेदारी!
है समान इक-दूजे पर हक!
है प्रेम परस्पर समान
न ज्यादा किसी का
न किसी का न्यून मान!
तो
तुमने कैसे कहा
मैं जिम्मेदारी तुम्हारी?
हो सकती हूँ!
लेकिन
उतनी ही तुम मेरी,
तुम्हें
मुस्काना मेरा
शर्माना मेरा
दिल को भाता था
तो
मुझे भी
तुम पर प्यार आता था
जब
तुम मुस्काते थे
मेरी मुस्कान देख
जब
बाट में याद आते थे
और
सामने आते तब मन को भाते,
जब
गरम भोजन का धुआँ मुझ पर उड़ाते थे,
जब
मुझे प्रेम से चिढ़ाते थे,
जब
बैठ पैरों में
नये मेहमान को चाहते थे
और
ढेर सारी सौगात लाते थे
तब
प्रेम खिलखिला जाता
एक बालकवत्
उसका व्यवहार हो जाता।
बताओ!
ये समानता नहीं है?
इसलिए कहती
छोड़ो
समाज की बातें
छोड़ो
आदमीयत की बातें
एक प्रेम की मानो
और
चल दो मेरे साथ
क्योंकि
मैं नहीं समर्थ
साथ रहने तुम्हारे
लेकिन
तुम नहीं असमर्थ
साथ चलने हमारे
इसलिए
कहती
चल दो न साथ मेरे
क्योंकि
सफर सुहाना
एक प्रेमी का
बिन दूजे
कैसे होगा?
चाहें कुछ भी कहो
प्रेमी
नहीं रहा पाएगा
बिन दूजे अकेले!
वो मर जाएगा
बस
देह से बच पाएगा,
और
तुम भी ऐसे ही हो
इसलिए
कहती मैं
प्रेमात्मा को निर्णय दो
हित तुम्हारे करने दो
वो सही करेगी
और
यही करेगी
साथ जाओ
न अकेले रह जाओ
क्योंकि
रह न पाओगे
एक कौने में
तुम
खुद को
और
पूरे घर को खाओगे।
इसलिए
साथ चल दो
फिर से हाथ से हाथ भर दो
ले लो
वही वचन
वही फेरे
जो पहली बार साथ में लिए थे
लो
ये
'चाकू'
अपनी प्रेमात्मा को
इस मरी देह से
मुक्त कर दो
और
साथ चल दो
जहां
बसेरा मेरा
सफर सुहाना कर दो मेरा
ओ मेरे तरुवर!
अपनी पुष्पलता के साथ चल दे।
देख
कुदरत भी कहती -
जोड़ा पंछी उड़ जाता है
पानी ध्वनि से गाता है
बादल भी साथ निभाता है
बिजली शब्द बनाता है
इंद्रधनुष भी आता है
जोड़े रंग साथ लाता है
और
ये पुष्प, पेड़
सभी
आज पुनः साथ चाह रहे हैं।
तो
क्या सोचते हो
चलो साथ मेरे
सफर सुहाना करने
पुनः ले लो फेरे।"
"कहती ठीक हो
मैं मानता हूँ बात
हो जाता हूँ तैयार
पुनः चलने तेरे साथ
लेकिन
न बिछड़ेंगे इस बार
ये पक्की बात?
ठीक है
चलो
ले चलो
मुझे अपने साथ
ये चाकू होगा मददगार
और
फिर
सब
पुनः
'सदाबहार'
वो भी हमेशा के लिए।"
कहने के तुरंत बाद
हाथ पहुँचा
चाकू के पास
और
वो उठ गया
"तैयार हूँ मैं!
पुष्पलता मेरी!
तेरे साथ चलने को
ये विधि करने को"
और
चाकू नस पर रख गया
जैसे ही चलाया
"पापा... पापा...
कहाँ हो आप?
कहाँ हो आप?"
"नहीं पुष्पलता!
नहीं!
'मुन्ना' जिम्मेदारी है
जो तुमने मुझे दी थी
जब जा रही थी तुम
मुझसे दूर
और अपने मुन्ना से,
तब दी थी
मैं नहीं आ सकता।
तुम्हारा प्रेम
और तुम
सब मुन्ना में है
मैं अधूरा नहीं हूँ!
न ये प्रेम अधूरा!
सब पूरा है
और सब खुश है।
तुम
अब बस कल्पना हो
जो पछतावे से आती है
अगर
होती तुम
तब प्रेम बढ़ जाता
अब
ये कुछ कम भी नहीं है
अगर
अब चला मैं साथ तुम्हारे
तो
वो कम हो जाएगा
क्योंकि
तुमने
इसे
अपने प्रेम जल से पोषा है
और
हमारे प्रेम का यही कोषा है
यही प्रमाण है
और
मेरे लिए
पुष्पलता भी यही है
इसलिए
अब तुम जाओ
जहां से आयी वही अपने कदम बढ़ाओ
फिर मत आना
क्योंकि
तुम
पछतावे के अलावा
नहीं बची कुछ।
एक पुतला पछतावे का
बस
न प्रेम की सजीवता
और
न जिम्मेदारी की
न हिस्सेदारी की
न अब मुझ पर हक तेरा
न हक अब मेरा
वो बदल गया है
सजीव पुष्पलता ने बदला था
मैं भी अब असमर्थ,
तो
क्षमा करना
मुझसे खुद को विदा करना
सफर
अकेला
सुहाना हो
और
विनती एक
पुनः न जीवन में मेरे तेरा आना हो
मैं खुश हूँ और पूरा भी
सफर तुम्हारा सुहाना हो।"
"पापा... पापा....
जागो... जागो...
बड़ी माँ बुला रही हैं
कितनी देर से आवाज लगा रही हैं
फिर गुस्सा हो जायेंगी
और
दोनों की पिटाई लगायेंगी
जागो.... जल्दी जागो..."
"जाग गया हूँ
मेरे छोटे से फूल
बैठो यहाँ
और
ये बताओ
मम्मी की कहानी सुनोगे।"
"आज अचानक से
चलो सुनाओ
मेरी
मम्मी की कहानी।"
"एक बार की बात है
जब मैं और तुम्हारी मम्मी
इस तरह बैठे थे
और
तभी
भूत आ गया
देख उसे मैं डर गया
लेकिन
मम्मी तुम्हारी
उस भूत पर भी भारी
उसे खूब मारा
और
वो बेचारा
भाग गया
पता है कैसे
अपनी पूँछ उठाकर।"
हंसी छूत जाती है
और
बुलावे की आवाज भी
आती है
मैं
मुन्ने को भेजता हूँ
और
एक बार फिर बातें
खुद से
खोता हूँ याद में
"हे पुष्पलता!
हो जहां भी
याद करती रहना
मत करना फ़िक्र मुन्ना की
क्योंकि
मैं हूँ ना
ख्याल रखने के लिए
और
तुम्हें जिन्दा रखने के लिए।"
नीचे से बुलावा आता है
और
मैं जाता हूँ
सीधे रसोई घर
थोड़ा मुन्ना को खिलाता हूँ
और थोड़ा खुद खाता हूँ
"वास्तव में
ये तुम्हारी संतान है
बाट भोजन की देख रहा था
मैं आया
और
मुस्कान दे दी।"
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