माटी बदरा
बंजर हूँ, सूखी हूँ,
बदरा मेरे, मैं बहुत भूखी हूँ,
प्यासी हूँ, बिन तेरे बासी हूँ,
माटी हूँ
नहीं किसी को भाती हूँ
जब तक तुम न मिलो
बदरा मेरे।।
जल तुझमें जो बना है
नई सृष्टि के लिए रब ने; मुझे ही तो चुना है
बिन तेरे छायी उदासी है
ये तपन; जैसे फ़ासी है
कब आओगे तुम
बिन तेरे माटी तेरी बन बैठी सूरज की दासी है।
हो तुम तब मैं सुंगधित हूँ
तेरे बिन क्या मैं गंधित हूँ?
बदरा मेरे
याद क्या तुझे भी आती है?
क्या कोई और स्वयं को सताती है?
क्या कोई और तुमसे सुगंधता पाती है?
या जीवन तेरा मेरे भाती है?।।
ये युग बीत गया है
चातक ने क्या गीत किया है
अंदेशा तेरे आने का मुझको हो गया है
देखो सूरज भी अब सो गया है।
बदरा मेरे
समय मिलन का आ गया है
सुगंधता से देखो मन सबका भा गया है
अब, तुझको मैं न जाने दूंगी
जल तेरे से निज को पूरा भिगूंगी
अंग अंग से तेरी मैं दासी बनूँगी
अंग अंग तुझे समर्पण करूंगी
हे मेरे प्रियतम
इस मिलन के बाद
अब मैं बंजर क्यों रहूंगी!
नई सृष्टि होगी,
और मैं साथ तेरे सर्व जग को सुगंधता दूंगी
जिसे ये कभी नहीं भूलेगा।।
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